जगन्नाथ जी का पट बंद - (चमत्कार)

एक बार स्वामी जी पर्यटन करते हुए अपने दल – बल के साथ जगन्नाथ पूरी पहुचे ! नित्य कर्म से निवृत हो भजनी के साथ प्रातः काल कीर्तन करने जगन्नाथ जी के मंदिर पहुचे ! ज्यों ही ढोलक पर थाप पड़ी, त्यों ही पंडे लोग रोकने के लिए जुट गए ! उन्होने स्वामीजी से कहा __”यहाँ ढोल ढाक बजने का नियम नहीं है ! इसे बंद कीजिए !” स्वामीजी बहुत समझाए, पर पडे लोग अपनी डफली बजाते ही रहे ! अंत में स्वामीजी मंदिर छोड़कर दलबल के साथ दूसरी जगह चले गए ! स्वामीजी के जाते ही जगन्नाथ जी का पट स्वयं बंद हो गया ! अब पंडे लोगों में तहलका मची ! पट खोलने का सारा प्रयास विफल रहा ! सबो ने निश्चय किया की बाबा जी को हटाने का यह दुष्परिनाम है ! सब मिलकर स्वामीजी के पास पहुचें ! बाबा कीर्तन में मग्न थे ! सरदार पंडा उनके सामने हाथ जोड़ कर खरे थे ! स्वामीजी की नज़र तो उनपर पड़ी किन्तु भजन समाप्त नहीं हुवा था इसलिए कुछ नहीं पूछ सके ! भजन समाप्त होने पर स्वामीजी ने पूछा __ “क्यों खड़े हो ? क्या चाहिये ?” पंडे ने कहा __’आपके आने के बाद ही जगन्नाथ जी का पट आप से आप बंद हो गया ! भोग – राग सब बंद हैं ! आप वही चल कर कीर्तन करे ! हमलोग आपको पहचान नहीं पाये ! इसलिए ऐसी भूल हो गई ! आप क्षमा करे ! भोग राग का बंद होना सुनकर स्वामीजी तुरंत भजनियो को वही चलने का आदेश दिया ! मंदिर में कीर्तन प्रारम्भ होते ही पट स्वयं खुल गया ! साथ ही सबों के हृदय कमल भी खिल गये !

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